देविंदर सिंह के हवाले से

सच शायद ही कभी शुद्ध होता है, सरल तो वह कभी नहीं होता.
– ऑस्कर वाइल्ड (‘द इंपोर्टेंस ऑफ़ बीइंग अर्नेस्ट)

जम्मू-कश्मीर में डीएसपी देविंदर सिंह के कथित आतंकियों के साथ पकड़े जाने की ख़बर आई है. इन आतंकियों को लश्कर और हिज़्बुल से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है. इस पुलिस अधिकारी के घर से कुछ ख़तरनाक हथियार भी मिले हैं, ऐसा रिपोर्ट में लिखा गया है. संसद हमले में शामिल होने के दोष में अदालत से मौत की सज़ा पाए अफ़ज़ल गुरु ने अपने वक़ील को लिखे पत्र में बताया था कि देविंदर सिंह उसे प्रताड़ित करता रहता था और एसटीएफ़ के अधिकारी और एसपीओ उससे पैसे की उगाही भी करते थे. गुरु ने यह भी लिखा था कि देविंदर सिंह ने ही उसे एक अनजान आदमी को दिल्ली पहुंचाने और कुछ लोगों को ठहराने का इंतज़ाम करने को कहा था. ख़ैर, इन बातों को जाँच या सुनवाई में संज्ञान नहीं लिया गया. पूरी प्रक्रिया में गुरु के आतंकी बनने की कहानी के लिए कोई जगह नहीं थी. ख़ैर, अफ़ज़ल गुरु को अदालत ने मौत की सज़ा दी और फ़रवरी, 2013 में उसे फ़ांसी दे दी गयी. …‘to satisfy the collective conscience of the people of India’…

साल 2001 के संसद भवन हमले के प्रकरण को मैं पहले दिन से ही एक विराट उपन्यास की तरह देखता हूँ. उस दिन कई कॉमरेडों के साथ संसद मार्ग पर प्रदर्शन की तैयारी थी. कारगिल की लड़ाई में जान देनेवाले सैनिकों के ताबूत की ख़रीद में घोटाले का मामला सामने आया था. तब महान समाजवादी जॉर्ज फ़र्नांडिस वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री हुआ करते थे. दिसंबर की उस तारीख़ को मेरा जन्मदिन भी होता है, सो कुछ रात की ख़ुमारी और कुछ अपने आलसीपन की वजह से मैं देर से सीधे जंतर-मंतर पहुँच गया. और वहाँ तो कुछ और ही चल रहा था…

इस कहानी में दिल्ली पुलिस के एसीपी राजबीर सिंह और इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा उल्लेखनीय किरदार रहे हैं. इनकी अगुवाई में ही इस केस की जाँच हुई थी. जाँच को बहुत तेज़ी से पूरी करने के लिए इनकी बहुत तारीफ़ भी हुई थी. सिंह के खाते में कई मुठभेड़ रहीं, सब-इंसपेक्टर से एसीपी बनने की यात्रा में उन्होंने उपलब्धियां बटोरीं और विवादों में भी रहे. मार्च, 2008 में गुड़गाँव में एक प्रॉपर्टी डीलर ने उनकी हत्या कर दी. उसी साल सितंबर में बाटला हाउस में आतंकियों से मुठभेड़ में शर्मा की मौत हो गयी. एक अन्य अहम किरदार दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक एसएआर गिलानी की पिछले साल दिल के दौरे से मौत हो गयी. गिलानी को अज्ञात हमलावरों ने फ़रवरी, 2004 में हमला किया था. निचली अदालत से फ़ांसी की सज़ा पाए गिलानी को बड़ी अदालतों ने संसद हमले में शामिल रहने के आरोपों से बरी कर दिया था. उसके बाद भी राजद्रोह आदि आरोपों में वे कुछ समय हिरासत में रहे थे.

बाद के सालों में बड़े अधिकारियों के हवाले से ख़बरें छपीं कि संसद का हमला सरकारी एजेंसियों ने करवाया था. कई लोगों ने ऐसी बातों को कॉन्सिपिरेसी थियरी कहा. जो भी हो, संसद हमले और उससे जुड़े किरदारों के बारे में कुछ भी साफ़ नहीं हो सका है. लगता है, संसद हमला मामला एक कभी न ख़त्म होनेवाली कहानी है. किरदारों का आना-जाना लगा रहेगा… सीरीज़ आगे बढ़ती रहेगी…

मध्य-पूर्व के विभिन्न तबक़ों की आपसी हिंसा और तबाही के बारे में एक लेख में अब्बास बर्ज़ेगर ने बेहद मार्मिक पंक्ति लिखी है, कल से उसी के बारे में सोच रहा हूँ…

‘अंतिम संस्कार के समय हम सभी वही प्रार्थनाएँ करते हैं. दर्द का कोई बही नहीं होता. क्रांति में और युद्ध में हर किसी का सच वास्तविक होता है.’

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