‘मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है’

समकालीन इतिहास की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें विचारधारात्मक संकीर्णताएँ रचनाकारों और रचनात्मकता को अक्सर निशाना बनाती रही हैं और इस प्रवृति के शिकार न सिर्फ़ वे रचनाकार होते हैं जो विचारधारा-विशेष के विरोधी होते हैं, बल्कि वे भी होते हैं जो उस विचारधारा के उत्कृष्ट एवं उद्दात आदर्शों के लिए हर तरह की कठिनाईयाँ उठाते रहते हैं. बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में शुमार नाज़िम हिकमत (15 जनवरी 1902 – 3 जून 1963) के साथ भी उनके ही साथी कम्युनिस्टों ने कुछ ऐसा ही बर्ताव किया था. जबकि इस महाकवि को साम्यवादी विचारों के समर्थन और तुर्की में जनवादी संघर्षों से जुड़े होने के कारण बरसों जेल रहना पड़ा था, और अंततः देश छोड़ कर निर्वासन वरण करना पड़ा था. नाज़िम हिकमत की पुण्यतिथि पर उनके जीवन के उस दौर को याद करना बहुत ज़रूरी हो जाता है जब उन्हें कॉमरेडों के दुष्प्रचार से दो-चार होना पड़ा था और उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी से निकाल दिया गया था. ऐसा करना इसलिए ज़रूरी है कि यह हिस्सा उनकी वैचारिकी के साम्यवादी और उनकी पहचान के राष्ट्रवादी उत्सव की चकाचौंध में कहीं दब-सा गया है. इस प्रकरण को खंगालना इसलिए भी ज़रूरी है कि राजनीतिक और सांस्कृतिक वर्तमान कहीं अधिक क्रूर संकीर्णताओं की जद में है. शायद हिकमत की बातें बेहतर सृजनात्मक परिदृश्य बनाने में हमारी मदद कर सकती हैं.

nazimhikmetranनाज़िम हिकमत ने मध्यकालीन तुर्की के एक महत्वपूर्ण धार्मिक-राजनीतिक व्यक्तित्व शेख़ बद्रेदीन पर 1936 में महाकाव्य प्रकाशित किया था. वामपंथियों द्वारा संभावित हमले का अंदेशा करते हुए उन्होंने इस रचना के साथ एक संक्षिप्त आलेख भी लिखा था जिसमें उन्होंने आलोचकों का जवाब देने की कोशिश की थी. हिकमत का यह अंदेशा बेवज़ह नहीं था. तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी के कई प्रभावशाली सदस्य लगातार उनकी आलोचना कर रहे थे और उनकी कई रचनाओं को साम्यवाद-विरोधी मान रहे थे. उल्लेखनीय है कि उन्हीं रचनाओं के कारण बाद में हिकमत को ‘रूमानी क्रांतिकारी’ की संज्ञा दी गयी. इस रचना के प्रकाशन से पूर्व ही उन्हें ‘स्टालिन-विरोधी’ होने का आरोप लगाकर पार्टी से निकाल दिया गया था. हिकमत और उनके साथियों द्वारा बनाये गए अन्य संगठन को सोवियत रूस की पार्टी ने मान्यता देने से मना कर दिया था. बहरहाल, तुर्की पार्टी जल्दी ही भयानक सरकारी दमन के कारण जल्दी ही ख़त्म हो गयी. इसके बाद बरसों तक किसी पार्टी से बिना सम्बद्ध रहे हिकमत राजनीतिक और रचनात्मक रूप से सक्रिय बने रहे.

शेख़ बद्रेदीन पर केन्द्रित महाकाव्य के साथ अपनी टिप्पणी में नाजिम हिकमत ने लिखा था: ‘इन पंक्तियों को लिखते हुए ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले उन युवाओं को कुछ ऐसा कहते हुए देख सकता हूँ- “देखो, वो मस्तिष्क और ह्रदय को अलग-अलग कर रहा है, कह रहा है कि उसका मस्तिष्क तो ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक तथ्यों को तो स्वीकार कर रहा है, पर हृदय दर्द से पीड़ित है. इस मार्क्सवादी को तो देखो…”. मैं उन्हें वैसे ही देख रहा हूँ जैसे मैं इतिहास-लेखन के विशेषज्ञ को देख पा रहा हूँ जो मेरे लेखन के शुरुआत को पढ़ कर हँस रहा है.

और मैं यह जो स्पष्टीकरण दे रहा हूँ, वह उनके लिए नहीं है, बल्कि उनके लिए है जो मार्क्सवाद से अभी परिचित हुए हैं और उनमें वैसा वामपंथी दंभ नहीं है.

क्या एक चिकित्सक यक्ष्मा के कारण मृत अपने बच्चे की मृत्यु पर शोक इसलिए नहीं करेगा क्योंकि उसे पहले से ही पता था कि बच्चे की मृत्यु निश्चित है? क्या मार्क्स पेरिस कम्यून के मृतकों के लिए दुखी नहीं हुए थे- ख़ुद में उन्हें ‘दर्द के गीत’ की तरह महसूस करते हुए- इसके बावजूद कि उन्हें पता था कि कम्यून को नष्ट कर दिया जायेगा? और, क्या ‘कम्यून नहीं रहा, कम्यून ज़िन्दाबाद’ के नारे लगाते लोग दुखी नहीं थे?

एक मार्क्सवादी मशीन या यंत्र-मानव नहीं, बल्कि हाड़-माँस, स्नायु, मस्तिष्क और ह्रदय से बना एक ऐतिहासिक, सामाजिक, और ठोस मनुष्य होता है.’

हिकमत की मित्रता सादुल्लाह, स्वत दरविश, महमूद येसारी, नजफ़, सबीहा जैसे लेखकों-पत्रकारों से थी जो बिना किसी पार्टी के सदस्य होते हुए भी फ़ासीवाद और नस्लभेद के विरुद्ध सक्रिय थे और अपने को राष्ट्रवादी कहते थे. मौके की तलाश में लगे विरोधी कॉमरेडों ने उनके इन संबंधों का बहाना बनाकर वामपंथी पत्रों में नाज़िम हिकमत के ख़िलाफ़ लेख लिखे जिसमें उन्हें ‘राष्ट्रवादी’, ‘बुर्जुआ’ आदि कहा जाता था.

हिकमत ने अपनी टिप्पणी में ‘छलिया वामपंथी’, वामपंथी दंभ’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर अपने क्षोभ को स्पष्ट कर दिया है. उन्होंने यह भी कह दिया है कि ऐसे तत्वों के साथ संवाद संभव नहीं है. नाज़िम हिकमत उन वामपंथी-जनवादी लोगों से मुख़ातिब हैं जो ऐसे अमानवीय दर्प से अछूते हैं. एक कविता में वे कहते हैं:

मेरे पास चाँदी की लगाम वाला घोडा नहीं है
पुरखों की छोड़ी हुई कोई संपत्ति नहीं जिसपर बसर कर सकूँ,
ना धन, ना कोई जायदाद –
मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है
शहद का एक कटोरा
आग की तरह लाल!

(जनसत्ता में 3 जून, 2013 को प्रकाशित)

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