अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ब्रिक्स देशों को यह गारंटी देनी होगी कि वे कोई नयी ब्रिक्स मुद्रा नहीं बनायेंगे और न ही डॉलर को हटाने के लिए किसी अन्य मुद्रा को अपनायेंगे. ऐसा नहीं करने पर उन्होंने 100 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की धमकी दी है. इस संबंध में कुछ बातों को रेखांकित किया जाना चाहिए.

ट्रम्प के चुनाव अभियान में शुल्क का मुद्दा बहुत अहम रहा है. उनका मानना है कि अधिक शुल्क लगाने से अमेरिकी और अन्य उत्पादक अमेरिका लौटेंगे तथा बाक़ी दुनिया अमेरिकी उत्पादों का अधिक उपभोग करेगी. इस प्रकार अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत हो जायेगी.
ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति होंगे, इसलिए उन्हें वह सब करना चाहिए, जिससे अमेरिका को फ़ायदा हो. रही बात शुल्क लगाने की, तो इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी दबाव बढ़ेगा और उन्हें महँगी ख़रीद करनी पड़ेगी. दूसरे देश भी अमेरिकी उत्पादों पर उसी तरह शुल्क लगायेंगे. यहाँ मसला यह होगा कि किसे क्या ज़रूरी है और कौन वैकल्पिक बाज़ार खोज सकता है.
ब्रिक्स देशों में चीन से अमेरिका का पहले से व्यापार युद्ध चल रहा है. रूस और ईरान पर आर्थिक पाबंदियाँ हैं. भारत, अमीरात, ब्राज़ील, मिस्र आदि से अमेरिका के संबंध ठीक-ठाक हैं. ऐसे में ट्रम्प का बयान कोई ख़ास मायने नहीं रखता है.
ब्रिक्स लंबे समय तक अपनी मुद्रा लाने की स्थिति में नहीं है. डॉलर अभी भी बहुत ताक़तवर मुद्रा है और ब्रिक्स देश प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर उससे बहुत दूर जाने की स्थिति में नहीं हैं. वे यह कोशिश कर रहे हैं कि उनका आपसी लेन-देन उनकी अपनी मुद्राओं में हो. इस पर ट्रम्प चाहकर भी कुछ नहीं कर पायेंगे. यूरोप के कमज़ोर होने से यूरो और पाउंड पर भी दबाव है.
ब्रिक्स भविष्य में ऐसी व्यवस्था ज़रूर कर सकता है, जिसके तहत आपसी लेन-देन की कोई ऐसी प्रणाली बने, जिसमें अपनी मुद्राओं के लिए कोई साझा पैमाना बने, पर यह आसान काम नहीं होगा. यह इस पर भी निर्भर करेगा कि उनका आपसी लेन-देन कितना है.
चीन अमेरिका, भारत, रूस, अनेक यूरोपीय देशों समेत 130 देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. बाक़ी देशों के साथ वह दूसरे या तीसरे पायदान पर है. उसे डॉलर की ज़रूरत भी होगी और वह डॉलर एवं अन्य मुद्राओं के साथ खेल भी सकता है.
भारत-अमेरिका व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है और वहाँ से भारतीय भी बड़ी कमाई भेजते हैं. सो, यहाँ भी डॉलर प्रासंगिक रहेगा. ब्राज़ील अमेरिका का पड़ोसी है. अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में सभी पक्षों का प्रभाव है, तो वहाँ भी डॉलर चलेगा ही. रूस और ईरान जैसे पाबंदी प्रभावित देश भी डॉलर (या सोना, बिटक्वाइन आदि) दबा कर रखते हैं, ताकि मौक़े पर काम आए.

अमेरिका को असली डर यह है कि ब्रिक्स समूह और उसके सहयोगी देशों का उत्पादन बास्केट बढ़ता जा रहा है. जिसका बास्केट बड़ा होगा, मुद्रा बाज़ार में भी उसकी चलेगी. चीन का उदाहरण सामने है. डॉलर केवल मुद्रा नहीं है, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद का एक बड़ा हथियार है. वह हथियार अहम तो है, पर कुंद हो रहा है क्योंकि आर्थिक पाबंदियों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक हितों के लिए हो रहा है.
डॉलर को ताक़त देनी है, तो अमेरिकी उत्पादन को बढ़ाना होगा. खाने-पीने के उद्योग को छोड़ दें, तो अमेरिकी कार्यबल का लगभग पाँच फ़ीसदी हिस्सा मैनुफ़ैक्चरिंग में है. इसे शुल्क लगाकर और युद्ध कर बेहतर नहीं किया जा सकता है. अभी चीन ने सऊदी अरब में डॉलर बांड्स को दस-बीस गुनी क़ीमत में बेचा है. यह एक तरह से डॉलर को छापना है. अमेरिका को ऐसी स्थितियों से बचना होगा.
बहरहाल, नयी विश्व व्यवस्था आकार ले रही है, तो झंझावात तो आते ही रहेंगे.

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