प्रधानमंत्री मोदी ने किसान सम्मान निधि की 21वीं क़िस्त जारी की है. इस योजना में नौ करोड़ से अधिक किसानों को 20 क़िस्तों में अब तक 3.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक दिये जा चुके हैं. अभी संपन्न हुए बिहार चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं को रोज़गार शुरू करने के लिए 10 हज़ार रुपये की आर्थिक सहायता भेजी गई है. आगे रोज़गार के हिसाब से दो लाख रुपये तक की सहायता देने की घोषणा की गई है. बिहार चुनाव की घोषणा से पहले राज्य सरकार ने विभिन्न प्रकार के भत्तों और पेंशन में भी बढ़ोतरी की थी. केंद्रीय स्तर पर और कई राज्य सरकारों द्वारा नगद बाँटने की अनेक योजनाएँ चल रही हैं. अनाज और अनुदान से जुड़ी योजनाएँ भी वर्षों से चल रही हैं. साल 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में हर परिवार को एक निश्चित राशि देने का वादा किया था.
ऐसी वित्तीय सहायता योजनाओं के समर्थक भी हैं और आलोचक भी. कई लोग इसे रेवड़ी बाँटना भी कहते हैं. समर्थक मानते हैं कि इनसे समाज के विभिन्न वर्गों का सशक्तीकरण होता है, तो आलोचक वित्तीय बोझ का हवाला देते हैं. ऐसे तमाम तर्कों के कुछ मतलब हो सकते हैं, लेकिन इस प्रकरण को व्यापक संदर्भों में देखा जाना चाहिए.
लोक कल्याणकारी योजनाओं की आवश्यकता इसलिए है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में समानता लाई जा सके. इस संदर्भ में सार्वभौम बुनियादी आय (UBI) की प्रासंगिकता बढ़ जाती है. भारत समेत तमाम लोकतंत्रों में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा लगातार कमज़ोर हुई है और राज्य की शक्ति भी बहुत घटी है. जनसंख्या के बड़े हिस्से को उसकी नियति के भरोसे छोड़ दिया गया है, जिसकी स्थिति को सुधारने में न तो राज्य की कोई रुचि रही है, न ही उसके पास इसके लिए ज़रूरी संसाधन हैं और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति है. इसकी परिणति यह हुई है कि धनिक और निर्धन के बीच अंतर निरंतर बढ़ता गया है. राजनीतिक और सामाजिक विभाजन भी बढ़ा है. इसका एक गंभीर परिणाम भ्रष्टाचार और अतिवाद के रूप में भी हमारे सामने है.
ऐसे में यह केवल संयोग नहीं है कि कई वर्षों से निर्धनों और बेरोज़गारों को न्यूनतम आय देने की आवश्यकता पर चर्चा होने लगी है. इसे नव-उदारीकरण वाले लोकतंत्र की विवशता के रूप में देखा जाना चाहिए तथा यह भी समझा जाना चाहिए कि कल्याणकारी योजनाओं की रूप-रेखा भी पहले की तरह नहीं होगी. बुनियादी आमदनी को लेकर दुनिया में हुए कुछ प्रयोगों और रहे प्रस्तावों को देखा जाना चाहिए.
फ़िनलैंड में जनवरी, 2017 में दो हज़ार बेरोज़गार युवाओं को हर माह 560 यूरो भत्ता देने की योजना प्रारंभ हुई थी, जो विभिन्न कारणों से दो वर्ष तक ही चल पायी थी. फ़रवरी 2019 में इस योजना के बारे में फ़िनलैंड के सामाजिक मामले एवं स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि भत्ता देने से रोज़गार के मामले में तो कोई फ़ायदा नहीं हुआ, पर अधिकतर लाभार्थियों ने बताया कि उनका स्वास्थ्य बेहतर है और तनाव बहुत कम हो गया है. जैसा कि इस रिपोर्ट को लिखनेवाले शोधार्थियों का मानना है और यह एक स्थापित तथ्य भी है कि किसी तरह की वित्तीय सुरक्षा होने से लोगों को अच्छा अनुभव होता है. हमारे देश में भी ग़रीबी, कुपोषण, अवसाद, कमतर आत्मविश्वास और बीमारी आदि का गहरा संबंध है.
अध्ययन से यह भी पता चला कि लाभार्थी अब अन्य लोगों और सरकार पर अधिक भरोसा करने लगे हैं तथा रोज़गार पाने की उनकी आशाएं भी बढ़ी हैं. तब यह कहा जा रहा था कि फ़िनलैंड बहुत ही छोटा देश है और उसका प्रयोग भारत के लिए कोई आदर्श नहीं हो सकता है. एक हद तक यह तर्क सही है, पर यदि विभिन्न प्रयोगों को ध्यान में रखा जाए, तो हमारे यहां ऐसी कोई योजना लागू करने में मदद मिल सकती है. छोटा और बड़ा होने का तर्क एक हद तक ही सही है. लेकिन यूरोप के तमाम देश हमसे आकार और आबादी में छोटे हैं, तो क्या हम उनकी तरह की ही अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली का त्याग कर दें?
उन्हीं दिनों ब्रिटेन में सार्वभौम आय योजना से संबंधित दो शोध प्रकाशित हुए थे. अर्थशास्त्री स्टीवर्ट लांसले और हॉवार्ड रीड के अध्ययन में कहा गया था कि ब्रिटेन में हर किसी को साप्ताहिक न्यूनतम आय देने की योजना पर जितना ख़र्च आयेगा, वह 2010 के बाद से कल्याणकारी योजनाओं में सरकार द्वारा की गई कटौती से कम होगा. इसमें कहा गया है कि हर वयस्क को कर रहित 60 पाउंड, 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को 175 पाउंड और 18 साल से नीचे के बच्चों को 40 पाउंड हर सप्ताह दिये जा सकते हैं. इस प्रस्ताव का लक्ष्य देशभर में बढ़ती निर्धनता और विषमता को रोकना है.
इसमें भत्ता देने या न देने में किसी अन्य आय की कोई शर्त नहीं रखी गयी है. इसमें कुल ख़र्च 28 अरब पाउंड होगा, जो एक दशक की कटौतियों से कम है. इसमें सबसे कम कमाने वाले कामगारों के लिए 15 प्रतिशत आयकर लगाने और मौजूदा आयकर में मामूली बढ़ोतरी का प्रस्ताव भी है. इसके साथ शिशु भत्ता और राजकीय पेंशन पर रोक लगाने के लिए सुझाव दिया गया है. अन्य लाभ पहले की तरह ही रहेंगे. अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो इससे ब्रिटेन के 75 प्रतिशत परिवारों को लाभ होगा और अन्य का ख़र्च बढ़ेगा. इस रिपोर्ट से पहले न्यू इकोनॉमिक्स फ़ाउंडेशन ने जो प्रस्ताव दिया है, उसमें कर रहित भत्तों को हटाकर हर वयस्क को सप्ताह में 48.08 पाउंड देने की बात है.
न्यूनतम आय योजना का एक बड़ा उदाहरण मकाऊ है. यहां 2008 से ही ऐसी आमदनी दी जाती है. इस साल हर स्थायी निवासी को 10 हज़ार पताका (एक पताका भारतीय मुद्रा में 11 रुपये से कुछ अधिक है) और अस्थायी निवासी को छह हज़ार पताका दिया जाता है. यह पैसा शहर के जुआ कर से आता है. मकाऊ दुनिया का कसीनो कैपिटल है. हालाँकि यह राशि बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है और यह साल में एक बार दिया जाता है.
कनाडा के हैमिल्टन शहर में 2017 में तीन साल के लिए ऐसी योजना चलाई गई थी. पर्यवेक्षकों का मानना था कि इस योजना के लाभ दिखने लगे हैं. लाभार्थियों के आत्मसम्मान और उम्मीदों में बढ़ोतरी देखी गई थी. यूरोप में बार्सिलोना में सबसे पहले अक्टूबर, 2017 में ऐसी योजना शुरू की गयी थी, जिसकी अवधि दो साल थी. उसमें शहर के सबसे ग़रीब इलाक़े के एक हज़ार परिवारों को नगदी दी गई थी. इनमें से 900 परिवार ‘सामाजिक आर्थिकी’ परियोजनाओं में भी भागीदारी करते थे, जो हमारे यहाँ की मनरेगा जैसी योजनाएँ हैं.उस दौरान हैमिल्टन राउंडटेबल फॉर पॉवर्टी रिडक्शन के निदेशक टॉम कूपर ने कहा था कि उनकी व्यक्तिगत राय है कि न्यूनतम आमदनी 21वीं सदी की प्रमुख सामाजिक नीति होगी. दुनिया के सबसे धनी और सफल उद्यमी इलोन मस्क भी बार-बार कहते हैं कि बुनियादी आय अंतत: अनिवार्य हो जायेगी, हालाँकि वे इसके भयावह परिणामों की आशंका भी जताते हैं. अभी उन्होंने यह भी कहा है कि एआई और रोबोटिक्स के प्रसार से भविष्य में काम करना ऐच्छिक हो जायेगा और एक समय ऐसा भी आयेगा, जब पैसे की प्रासंगिकता नहीं होगी.
अमेरिका में कुछ जगहों पर ऐसी योजनाओं के प्रस्ताव थे. भारत में 2011 से 2013 बीच इंदौर के आठ गाँवों में सेल्फ़ इंप्लॉयड वीमेंस एसोसिएशन (सेवा) ने नगदी मुहैया करायी थी. साल 2018 के आर्थिक सर्वे में भारत सरकार के सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने जब न्यूनतम आमदनी की बात कही थी, तब उन्होंने लिखा था कि उन्हें सेवा के इस प्रयोग से प्रेरणा मिली है. सिक्किम में भी ऐसी पहल का प्रस्ताव था. देश-दुनिया के अनुभवों को लेते हुए भारत में समुचित बुनियादी आय लागू करने के बारे में गंभीरता से सोचा जाना चाहिए. विभिन्न उपायों से धन जुटाना और सामाजिक कल्याण की अन्य योजनाओं के साथ इसका समायोजन करना विशेष चुनौती नहीं है.

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