सभी देश, ख़ासकर पश्चिम के धनी देश, आत्ममंथन करें कि इतने विकास के बाद भी वे अपने लोगों को स्वास्थ्य और रोज़गार मुहैया क्यों नहीं करा पाए हैं.
पत्रकार मार्खेस
मार्खेस का पत्रकारों को संदेश- ‘व्यापक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’ का होना, अमानवीयकरण से बचना, ‘पढ़ना’ और तकनीक पर कम निर्भरता.
अधकचरी समझ पर चमगादड़ जैसा लटका मीडिया
प्राचीन रोमन इतिहासकार टैसिटस ने लिखा है कि सत्य को जाँच और देरी से निर्धारित किया जाता है तथा झूठ को जल्दबाज़ी और अनिश्चितता से.
‘मेरे पास बस शहद का एक कटोरा है’
एक मार्क्सवादी मशीन या यंत्र-मानव नहीं, बल्कि हाड़-माँस, स्नायु, मस्तिष्क और ह्रदय से बना एक ऐतिहासिक, सामाजिक, और ठोस मनुष्य होता है.
तरस आता है उस देश पर : दो अनुदित कविताएं
तरस आता है उस देश पर : दो अनुदित कविताएं
तेज़ाब हमले
होना तो यह चाहिए कि फ़िल्म छपाक के हवाले से ही सही, तेज़ाब से पीड़ित लड़कियों की व्यथा, इस अपराध को रोकने के उपायों, दोषियों को दंडित करने आदि पर चर्चा हो.
देविंदर सिंह के हवाले से
संसद हमले और उससे जुड़े किरदारों के बारे में कुछ भी साफ़ नहीं हो सका है. लगता है, संसद हमला मामला एक कभी न ख़त्म होनेवाली कहानी है. किरदारों का आना-जाना लगा रहेगा…
जनसंख्या नियंत्रण, बहुसंख्यकवाद और धुर-दक्षिणपंथ
कुछ समय से जनसंख्या नियंत्रण का क़ानून बनाने का अभियान भी चल रहा है. ऐसा लगता है कि बहुत जल्दी मोदी सरकार ऐसा क़ानून लायेगी.
बोरिस जॉनसन की जीत: उदारवादी लोकतंत्र को एक और झटका
इंग्लैंड के जिन इलाक़ों में ब्रेक्ज़िट के पक्ष में ज़्यादा वोट पड़ा था, वहाँ लेबर पार्टी को सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है.
ब्रिक्स: एक विफल अभियान!
ब्रिक्स का पतन महाशक्तियों की नीतियों की वैधता के लिए जरूरी है.
आतिश तासीर का वैचारिक भ्रम
औपनिवेशक जैसा पूरी तरह हो जाने की आकांक्षा आतिश तासीर में भी है.
यह है छठ पूजा
कांच ही बांस के बहन्गिया
बहंगी लचकत जाये
होईं न बलम जी कहंरिया
बहंगी घाटे पहुंचाए…..
धुर-दक्षिणपंथ का आदर्श जोसेफ मैकार्थी
मैकार्थी के इस दक्षिणपंथी हमले के शिकार कई लोग आज दुनिया भर में आदरणीय हैं. कुछ नाम तो बीसवीं सदी के महानतम व्यक्तित्व हैं- अल्बर्ट आइंस्टीन, चार्ली चैप्लिन, बर्तोल्त ब्रेष्ट, हॉवर्ड फास्ट, एलेन गिंसबर्ग, पॉल स्वीजी, ऑरसन वेल्स.
रवीश कुमार के सम्मान से चिढ़ क्यों!
‘आइटी सेल’ मानसिकता का विषाणु उदारवाद, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की पक्षधरता का दावा करनेवाले के मस्तिष्क को भी संक्रमित कर रहा है.
रॉबर्ट मुगाबे और पश्चिम के पैंतरे
मुगाबे की खामियों और दमन के इतिहास को भी परखा जायेगा, लेकिन आज सबसे जरूरी इस बात की पड़ताल है कि आखिर पश्चिमी देशों को मुगाबे से इतनी चिढ़ क्यों है.
हिंदी सिनेमा में लैला-मजनूँ
सबसे पहले मूक फ़िल्मों के दौर में मदान थिएटर के बैनर से 1922 में लैला-मजनूँ की कहानी को परदे पर उतारा गया.
पत्रकारिता के बाबत कुछ बातें
जनसंचार के छात्रों के साथ एक अनौपचारिक चर्चा में कुछ बातचीत
मिलिटरी ख़रीद और ख़र्च का चोखा धंधा
मिलिटरी ख़रीद और ख़र्च से किसको मुनाफ़ा होता है और मुनाफ़ा कमानेवाला इसे बरक़रार रखने के लिए क्या क़वायदें करता है.
जल संकट पर भयानक सरकारी लापरवाही
आज जब देश के बहुत बड़े हिस्से में सूखे की स्थिति है और मॉनसून बेहद कमज़ोर है, पानी की उपलब्धता और वितरण को लेकर चिंताएँ जतायी जा रही हैं. इस संकट में एक बार फिर से सालभर पहले आयी (14 जून, 2018) नीति आयोग की एक रिपोर्ट- कंपोज़िट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स- में दिए गए तथ्यों... Continue Reading →
बिहार: विकास दर में अव्वल, स्वास्थ्य में फिसड्डी
कथित रूप से आँकड़ों में सबसे ज़्यादा दर से विकासमान राज्य स्वास्थ्य के मामले में इतना लाचार और लापरवाह क्यों है?
