सबसे पहले मूक फ़िल्मों के दौर में मदान थिएटर के बैनर से 1922 में लैला-मजनूँ की कहानी को परदे पर उतारा गया.
पत्रकारिता के बाबत कुछ बातें
जनसंचार के छात्रों के साथ एक अनौपचारिक चर्चा में कुछ बातचीत
मिलिटरी ख़रीद और ख़र्च का चोखा धंधा
मिलिटरी ख़रीद और ख़र्च से किसको मुनाफ़ा होता है और मुनाफ़ा कमानेवाला इसे बरक़रार रखने के लिए क्या क़वायदें करता है.
‘Who is Bharat Mata?’
Prof Purushottam Agrawal has edited this valuable and important intervention.
जल संकट पर भयानक सरकारी लापरवाही
आज जब देश के बहुत बड़े हिस्से में सूखे की स्थिति है और मॉनसून बेहद कमज़ोर है, पानी की उपलब्धता और वितरण को लेकर चिंताएँ जतायी जा रही हैं. इस संकट में एक बार फिर से सालभर पहले आयी (14 जून, 2018) नीति आयोग की एक रिपोर्ट- कंपोज़िट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स- में दिए गए तथ्यों... Continue Reading →
तकता है तेरी सूरत हर एक तमाशाई…
यतींद्र मिश्र ने इस किताब के तमाम हिस्सेदारों के साथ मजमुआ की शक्ल में अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी का आलीशान मुजस्समा बनाया है.
बिहार: विकास दर में अव्वल, स्वास्थ्य में फिसड्डी
कथित रूप से आँकड़ों में सबसे ज़्यादा दर से विकासमान राज्य स्वास्थ्य के मामले में इतना लाचार और लापरवाह क्यों है?
कहो जी तुम क्या क्या खरीदोगे…
बारह किस्सों की यह किताब किस्सा तो है ही, वह इतिहास, समाजशास्त्रीय अध्ययन और सांस्कृतिक रिपोर्ट भी है. वह बहुत गहरे कहीं टीसती बेचैनी का त्रासद काव्य भी है.
फ़िलीस्तीन से नाता तोड़ने का संकेत
संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक परिषद में इज़रायल के पक्ष में भारत का मतदान करना एक असाधारण घटना है.
भारतीय छात्र: रियल इस्टेट, कोचिंग बिज़नेस
देश में कोचिंग और परीक्षा तैयारी केंद्रों का सालाना बिज़नेस 49,400 करोड़ (सात अरब डॉलर) का है.
The idea of ‘Soft Power’ As A Dangerous Nonsense
Soft Power! Is it something?
सीईओ का सालाना वेतन = मज़दूर के 941 साल
इस भयानक अनैतिक समय में हम यह आग्रह भी नहीं रख सकते कि पैसा कमाने का नैतिक रास्ता क्या है.
Prof. Sen! Modi’s also won the battle of ideas.
A comment on Prof Amartya Sen's article published in the NYT
मर्डोक मीडिया और ऑस्ट्रेलिया का चुनाव
क्या कोई राजनेता रूपर्ट मर्डोक के साम्राज्य से लोहा ले सकता है और जीत सकता है?
दार्शनिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण
प्रश्न शंकराचार्य को मानने या न मानने का नहीं है, आवश्यकता उनकी पद्धति, प्रणाली और प्रक्रिया से परिचय की है.
Not to beg mercy of the darkness
Uday Prakash is arguably one the most prolific, widely read and controversial writers whose works have been translated in many Indian and foreign languages.
लिबरल सरलीकरण है आतिश तासीर का लेख
भारतीय दक्षिणपंथ की सोच और हरकतें पोंज़ी फ़्रॉड की तरह होती हैं.
अपने ही जाल में उलझा भोजपुरी सिनेमा
जैसे बिहार और पूर्वांचल की राजनीति पिछड़ेपन, भ्रष्टाचार और अन्याय के मुद्दों पर बतकही से चलती है, वैसे ही भोजपुरी सिनेमा की विषय-वस्तु भी इन मुद्दों को सतही तरीके से अभिव्यक्त करती है.
वी. शांताराम: भारतीय सिनेमा के अण्णा साहेब
शांताराम की उपलब्धियों और उनके महत्व का आकलन ठीक से तभी हो सकता है, जब हम उनकी फिल्मों के साथ-साथ सिनेमाई इतिहास में उनके योगदान को हर आयाम से समझने का प्रयास करें.
लाहौरवाले दाता गंज बख़्श
अजमेर के महान सूफ़ी हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती ने लाहौर के सूफ़ी दाता गंज बख़्श साहिब के बारे में कहा था – “गंज बख़्श-ए-फ़ैज़-ए-आलम, मज़हर-ए-नूर-ए-ख़ुदा / नक़ीसान रा पीर-ए-कामिल, कामिलान रा रहनुमा”.
