अब तक पुरुष पुरुष होने की ग्रंथि से पीड़ित था, अब वह नेक्रोफिलिया का रोगी है. चिंता तब बढ़ जाती है जब यह रोग सामूहिक हो जाता है.
हिंदी सिनेमा में लैला-मजनूँ
सबसे पहले मूक फ़िल्मों के दौर में मदान थिएटर के बैनर से 1922 में लैला-मजनूँ की कहानी को परदे पर उतारा गया.
